किसी ने किया खूब लिखा है
सुना है इंसान कर्ज़दार होता है हर जनम का
मेरा जनम कर्ज़दार है इस जनम का
किया लिखने वाले ने हर जनम में मुझे कर्ज़दार चुना है
मेरे सिर का साया बचपन में चला गया
गरीबी भूख मेरी माँ और मैंने देखी है
जब मैं कुछ नासमझ था तो मैं समझदार हो गया
मेरा बचपन चला गया पर मैं कर्ज़दार हो गया
एक पल को मैं महसूस कर लेता माँ का आँचल
पर इस कर्ज़ को चुकाने पर मैं मजबूर हो गया
कर्ज़ चुकाते-चुकाते माँ के आँचल को महसूस न कर पाया मैं
वो खो गई कहीं उस चार दीवारी के अंदर
बहुत ढूँढा पर ढूँढ नहीं पाया मैं
इस कर्ज़ ने बहुत रुलाया मैं……
Jaypee shayari.in✍️

इस जनम का कर्ज़.
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