देखो, नज़रें झपकी ही थीं कि समय बदल गया।
मेरा गाँव ही मानो शहर में बदल गया।
जिसमें बचपना गुज़रा मेरा,
वो कच्ची गलियाँ आज पक्की हो गई हैं।
अब हर घर की दीवारें मिट्टी की नहीं रहीं,
सब पत्थर की बन गई हैं।
गाँव के एक छोर पर सूरज की किरण पड़ती थी,
वहीं बैठते थे बुज़ुर्ग,
और शहर-शहर की चर्चाएँ चला करती थीं।
घर के आँगन में बहुएँ-बेटियाँ,
दादा-पिता के हुक्के में आग डाला करती थीं।
अब वो अपनापन नहीं रहा,
गाँव बदला, शहर बना—अब वो इंतज़ार नहीं रहा।
जहाँ अतिथि के आने का,
महीनों तक इंतज़ार रहा करता था।
घर से होती थी बेटी की विदाई,
बेटी के घर का पानी पीता नहीं था पिता।
बेटी के घर का पानी पाप समझा जाता था,
इसलिए भूखा ही लौट आता था एक पिता।
आज का दौर देखो—गाँव शहर में बदल गया,
रहन-सहन बदला, दीवारें वही नहीं रहीं।
कच्ची मिट्टी की दीवारों में,
एक ही रसोई हुआ करती थी।
पड़ोस के हर चूल्हे की आग,
दूसरे घर से जला करती थी।
घर में जो भी बड़ा होता,
गाँव की बहू हर मर्द से पल्ला किया करती थी।
वक़्त बदला, गाँव बदला, रिवाज़ सब ढल गए,
बस ये बताओ… क्या इंसान भी बदल गए?
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