जब में घर से निकला ।
तो साथ उसका भी था।
दोनों थे घर स दूर । डर का साया भी साथ था।
कसूर मेरा इतना था ।
कि मैं गरीब का लाल निकला।
छोड़ चला वो एक दिन , दूर किसी देश को।
मेरी रोटी खास नहीं लगी उसको।
मेहनत मेरी बेकार लगी उसको।
आज वो किसी और के साथ रहते हैं।
मकान मेरे पास है उसका।
रोज मेरी आंगन में ताकते रहते हैं।
सोचता हूँ कि ये घर छोड़ दूँ,
उसकी यादों के सजाए वो सपने तोड़ दूँ।
जब वो गुजरती है पास से।
बीते किस्से उभर जाते हैं।
हम जब लौटे थे मोहब्बत के पास से,घूम
फिर के भी लौटकर उसी मोहब्बत के पास आ जाते हैं।
ग़मों का मेला उभर जाता है।
किसी की यादों का मेला उभर जाता है।
कोई पूछे हम से कि
ये मोहब्बत का रास्ता कहा तक जाता है।
अब उसकी यादों में
उसकी तस्वीरों को देखा करता हूँ।
कभी अकेलापन को महसूस करता हूँ।
कभी आईने में खुद को खड़ा कर के
बाते कर लिया करता हूँ।
उस आईने में खड़ा इंसान भी
मुझसे सवाल करने लगा है।
जवाब कुछ नही होता।
आँखों के आँसू दिखाकर
उसको शांत कर लिया करता हूँ।
- Jaypeeshayari.i ✍️
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