जब मोहब्बत में कोई ओर आ जाए तन्हाई आ जाए पर कविता ।

“बरसात, बूँदें और बेवफ़ाई — प्रेम का भीगा हुआ रूप”

बरसात हो रही है,

पानी की बूँदें झर-झर कर रो रही हैं।

लगता है तन्हाई के बादल

इनको भी घेर बैठे हैं।

 

तभी तो ज़मीं से मिलने के लिए

ये बूँदें भी तरस रही हैं।

कसूर इन हवाओं का है

जो एक छोर से उस छोर ले जाती हैं बादल।

 

टक-टक देखती है ज़मीं—

बरसात कब होगी,

उन पानी की बूँदों से

मुलाक़ात कब होगी।

 

इनकी मोहब्बत देख

शख़्स कोई और आ गया,

ज़मीं ने पानी की बूँदों से कहा—

“दगा करना तू अच्छा शिखा  गया…”

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