जब मोहब्बत में कोई ओर आ जाए तन्हाई आ जाए पर कविता ।

ज़मीं-ओ-आसमाँ: अधूरी मोहब्बत की एक दर्दभरी दास्तान

तू अगर ज़मीं है, तो मैं आसमाँ हूँ,

तू अगर बूंद है, तो मैं धुआँ हूँ।

ज़मीं-ओ-आसमाँ को समेटे बैठे हैं,

हम अपने ही अंदर ये आग दबाए बैठे हैं।

ज़मीं-ओ-आसमाँ के परिंदे,

आज किसी की याद में खोए हैं,

शिकारी के जाल में फँसे हुए,

अपने ही ख्वाबों में रोए हैं।

गुरूर था हमें भी कभी,

अपने इन परों की उड़ान पर,

ज़मीं-ओ-आसमाँ को नापने का,

हर एक अरमान पर।

मगर आज हक़ीक़त ने ऐसा मोड़ लिया,

कि हम अपने ही अपनों से हार बैठे हैं,

जो कभी साथ उड़ते थे हमारे,

आज उन्हीं के बीच लाचार बैठे हैं।


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