श्रेणी: जिंदगी शायरी।
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ज़िंदगी और समय पर हिंदी कविता।
ज़िंदगी पर कविता। ज़िंदगी और समय पर भावनात्मक कविता। यह कविता ज़िंदगी के उन पहलुओं को दिखाती है जहाँ समय, हालात और अपनों का व्यवहार इंसान को उम्र से पहले समझदार बना देता है। मंद–मंद चल रही है ज़िंदगी, ज़िंदगी को पता है। अभी तो बचपना गुज़रा था, बुढ़ापा आने को खड़ा है।ये समय…
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जात, समाज और दो परिंदे
कसूर उसका नहीं, मेरी जात का है। ऊँच-नीच का ख़याल उसका नहीं, इस समाज का है। दूर हो जाएँगे दो परिंदे, डर बस इस बात का है। नहीं तो ज़मीन भी उसकी है। और गवाह भी वो ही है, आज उसे समझाने का मोह है। डरता है समाज अपनों की खुशी को देखकर। जात-पात का…
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परिंदा और मंज़िल
दिलों में दिल को बसाने चला है परिंदा। न असमां का, न उड़ान का पता है। आसमान खुला है, देख जहान को। वो उलझनों में पड़ा है, है मंज़िल तेरी ऊपर , और ये जहाँ तेरे नीचे पड़ा है।
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अपनो से हारा हुआ हुं।
**“जाने क्यों अक्सर अपने ही, अपनों से खफ़ा हो जाते हैं,इसमें कहीं न कहीं किसी अपने की ही कोई ख़ता होती है।समय के गुज़र जाने पर यह बात समझ में आती है,कि छोटी-सी ज़िंदगी में इंसान को इंसान से ही ठोकर मिलती है।अक्सर जो अपने कहलाते हैं, वही अपनों को गिराना चाहते हैं,और इस छोटी-सी…