यूँ ही नहीं बदल जाते हर रिश्ते, कोई तो वजह होगी।
ग़ालिब कसूर तेरा-मेरा नहीं,
उन रिश्तों में कहीं न कहीं दग़ा की बात होगी।
बदनाम ज़माना करता है मोहब्बत को,
मोहब्बत नहीं,
जिस्म-जिस्म को चाहता है, रूह को नहीं।
जब रूह से मोहब्बत हो
तो जिस्म की बात नहीं।
आज तुम मेरी हो, कल उसकी —
ये जिस्म की भूख है
और मुझे उसकी प्यास नहीं।
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