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वक़्त बदला, गाँव बदला – यादों से शहर बनने तक
देखो, नज़रें झपकी ही थीं कि समय बदल गया। मेरा गाँव ही मानो शहर में बदल गया। जिसमें बचपना गुज़रा मेरा, वो कच्ची गलियाँ आज पक्की हो गई हैं। अब हर घर की दीवारें मिट्टी की नहीं रहीं, सब पत्थर की बन गई हैं। गाँव के एक छोर पर सूरज की किरण पड़ती थी, वहीं…