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  • जात, समाज और दो परिंदे

    जात, समाज और दो परिंदे

    कसूर उसका नहीं, मेरी जात का है। ऊँच-नीच का ख़याल उसका नहीं, इस समाज का है। दूर हो जाएँगे दो परिंदे, डर बस इस बात का है। नहीं तो ज़मीन भी उसकी है। और गवाह भी वो ही है, आज उसे समझाने का मोह है। डरता है समाज अपनों की खुशी को देखकर। जात-पात का…