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  • परिंदा और मंज़िल

    परिंदा और मंज़िल

    दिलों में दिल को बसाने चला है परिंदा। न असमां का, न उड़ान का पता है। आसमान खुला है, देख जहान को। वो उलझनों में पड़ा है,  है मंज़िल तेरी ऊपर , और ये जहाँ तेरे नीचे पड़ा है।