जब मोहब्बत में कोई ओर आ जाए तन्हाई आ जाए पर कविता ।

परिंदा और मंज़िल

दिलों में दिल को बसाने चला है परिंदा।

न असमां का, न उड़ान का पता है।

आसमान खुला है, देख जहान को।

वो उलझनों में पड़ा है,

 है मंज़िल तेरी ऊपर ,

और ये जहाँ तेरे नीचे पड़ा है।


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