श्रेणी: जिंदगी शायरी।

  • दग़ा फिर से शुरू की उसने …

    दग़ा फिर से शुरू की उसने …

    बो शक्ख फिर हमसे दोस्ती करना चाहता है हमारी नज़रों में फिर हमें गिरना चाहता है जिसने कभी हमें ज़लील किया था किसी ओर सख्श के लिए बो फिर से हमें ज़लीलियत दिखना चाहता हैं  

  • ज़िन्दगी की कहानी एक

    ज़िन्दगी की कहानी एक

    कुछ लिखे शब्द बस किताबों में दफ़न रहते है ओर कुछ दिलों के राज दिलों में ही रह जाते है ओर कुछ कहानियां किताबों में जप्त हो जाती है ओर कुछ ज़िन्दगी में उतर जाती हैं देखना ये है कि ये कहानी ज़िंदगी की कहाँ खत्म हो जाती है

  • मुसाफिर

    मुसाफिर

    मुसाफ़िर हूँ मैं, मंज़िलो का थक कर बैठ जाना मेरी फ़ितरत नहीं गुरूर है तुझको अपने हुस्न पर ज़रा इस उम्र को तो ढल जाने दे

  • ज़िंदगी और समय पर हिंदी कविता।

    ज़िंदगी और समय पर हिंदी कविता।

    ज़िंदगी पर कविता। ज़िंदगी और समय पर भावनात्मक कविता। यह कविता ज़िंदगी के उन पहलुओं को दिखाती है जहाँ समय, हालात और अपनों का व्यवहार इंसान को उम्र से पहले समझदार बना देता है।   मंद–मंद चल रही है ज़िंदगी, ज़िंदगी को पता है। अभी तो बचपना गुज़रा था, बुढ़ापा आने को खड़ा है।ये समय…

  • जात, समाज और दो परिंदे

    जात, समाज और दो परिंदे

    कसूर उसका नहीं, मेरी जात का है। ऊँच-नीच का ख़याल उसका नहीं, इस समाज का है। दूर हो जाएँगे दो परिंदे, डर बस इस बात का है। नहीं तो ज़मीन भी उसकी है। और गवाह भी वो ही है, आज उसे समझाने का मोह है। डरता है समाज अपनों की खुशी को देखकर। जात-पात का…

  • परिंदा और मंज़िल

    परिंदा और मंज़िल

    दिलों में दिल को बसाने चला है परिंदा। न असमां का, न उड़ान का पता है। आसमान खुला है, देख जहान को। वो उलझनों में पड़ा है,  है मंज़िल तेरी ऊपर , और ये जहाँ तेरे नीचे पड़ा है।

  • अपनो से हारा हुआ हुं।

    **“जाने क्यों अक्सर अपने ही, अपनों से खफ़ा हो जाते हैं,इसमें कहीं न कहीं किसी अपने की ही कोई ख़ता होती है।समय के गुज़र जाने पर यह बात समझ में आती है,कि छोटी-सी ज़िंदगी में इंसान को इंसान से ही ठोकर मिलती है।अक्सर जो अपने कहलाते हैं, वही अपनों को गिराना चाहते हैं,और इस छोटी-सी…