जब मोहब्बत में कोई ओर आ जाए तन्हाई आ जाए पर कविता ।

जात, समाज और दो परिंदे

कसूर उसका नहीं, मेरी जात का है।

ऊँच-नीच का ख़याल उसका नहीं,

इस समाज का है।

दूर हो जाएँगे दो परिंदे,

डर बस इस बात का है।

नहीं तो ज़मीन भी उसकी है।

और गवाह भी वो ही है,

आज उसे समझाने का मोह है।

डरता है समाज

अपनों की खुशी को देखकर।

जात-पात का ख़याल

तो कुछ दिन और कुछ रात का है।


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