तिनका तिनका जोडकर मैंने एक घर बनाया.
पंछियों-सा छोटा सा घर था,उसको मैंने प्रेम से सजाया।
चुनौतियों को चुनते हुए,मैने हर संघर्ष को अपनाया.
पानी बनकर बहता रहा ,हर पत्थर से टकराया।
कभी झरनों में खुद को पाया,कभी नदियों में समाया.
एक दिन सागर बनकर उठा ,उसकी लहरों से आश्मान छू आया ।
तिनका तिनका जोडकर पंछियों सा जो घर बनाया.
उसे अपने सपनों से बेइंतहा खूब सजाया
,तिनका तिनका कर मैने एक घर बनाया ।
आज उसी घर में मैं अकेला-सा हो गया हूं.
जिसे तिनका तिनका जोडकर बनाया.
अब उसी से बेपरबहा-सा हो गया हूं।
शायद खुद ही से दूर हो गया हूं.
ललकारता हूँ चुनौतियों को, आओ मुझ से। लाडो तुम।
इस रण मे मैं अकेला योद्धा हूं,
संघर्ष की लडाई मे ,
थका – सा , बूढ़ा – सा हो गया हूं।
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