अपनो से हारा हुआ हुं।

**“जाने क्यों अक्सर अपने ही, अपनों से खफ़ा हो जाते हैं,इसमें कहीं न कहीं किसी अपने की ही कोई ख़ता होती है।समय के गुज़र जाने पर यह बात समझ में आती है,कि छोटी-सी ज़िंदगी में इंसान को इंसान से ही ठोकर मिलती है।अक्सर जो अपने कहलाते हैं, वही अपनों को गिराना चाहते हैं,और इस छोटी-सी ज़िंदगी में,हर कोई किसी को गिराकर ही आसमान छूना चाहता है।”**

 


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