Mindblown: a blog about philosophy.
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ज़िंदगी और समय पर हिंदी कविता।
ज़िंदगी पर कविता। ज़िंदगी और समय पर भावनात्मक कविता। यह कविता ज़िंदगी के उन पहलुओं को दिखाती है जहाँ समय, हालात और अपनों का व्यवहार इंसान को उम्र से पहले समझदार बना देता है। मंद–मंद चल रही है ज़िंदगी, ज़िंदगी को पता है। अभी तो बचपना गुज़रा था, बुढ़ापा आने को खड़ा है।ये समय…
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एकतरफ़ा मोहब्बत की प्यास
यह शायरी एक ऐसी मोहब्बत की कहानी कहती है, जहाँ चाहत तो है लेकिन इज़हार की इजाज़त नहीं। “Ab ham khud ko duba bethe h .ab bhi aash h” पंक्ति इस बात को साफ़ दर्शाती है कि इंसान भले ही हालातों में हार गया हो, लेकिन दिल के किसी कोने में उम्मीद अब भी ज़िंदा…
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भगवान पर आधारित भक्ति शायरी
कहा कि मैंने मनमानी की, चरित्र से मैं गंदा हूँ। जिसका तू है, मैं भी तो उसी का बंदा हूँ। बस इतना समझ ले प्रभु, अभी तुझसे थोड़ा दूर हूँ, पर मोहब्बत आज भी है तुझसे, इसलिए खुद से ही मजबूर हूँ। तूने मुझे देखा है, पर मैं खुद को छुपाए फिरता हूँ, डर है…
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कसूर बेख़ुदी का था – मोहब्बत और ज़िंदगी की सच्ची शायरी
दर्द भरी मोहब्बत शायरी ज़िंदगी के उन जज़्बातों को बयान करती है, जिन्हें शब्दों में कहना आसान नहीं होता। कसूर इसका नहीं, इसकी बेख़ुदी का था, ज़माने में इसे यूँ ही किसी ने नहीं पटक दिया। इसके पीछे कसूर इसकी ज़िंदगी का है। यूँ ही ख़ामोश नहीं हो जाते लोग ज़माने में, किसी को…
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जात, समाज और दो परिंदे
कसूर उसका नहीं, मेरी जात का है। ऊँच-नीच का ख़याल उसका नहीं, इस समाज का है। दूर हो जाएँगे दो परिंदे, डर बस इस बात का है। नहीं तो ज़मीन भी उसकी है। और गवाह भी वो ही है, आज उसे समझाने का मोह है। डरता है समाज अपनों की खुशी को देखकर। जात-पात का…
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परिंदा और मंज़िल
दिलों में दिल को बसाने चला है परिंदा। न असमां का, न उड़ान का पता है। आसमान खुला है, देख जहान को। वो उलझनों में पड़ा है, है मंज़िल तेरी ऊपर , और ये जहाँ तेरे नीचे पड़ा है।
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दर्द, मोहब्बत और कफ़न तक का सफ़र
दर्द को देखना है तो मेरी दहलीज़ पर आ जा। फिर से जीना है तो मोहब्बत से दूर चला जा। नहीं तो ग़म तेरे साथ होगा। वो होगी किसी और की, और तू मेरा हक़दार होगा। ना तुझे जीने दूँगा, ना मरने— तेरे हर लफ़्ज़ में उसका नाम होगा। जब थक जाएगा तू अपने ग़म…
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रिश्तों की वजह और जिस्म की भूख।
यूँ ही नहीं बदल जाते हर रिश्ते, कोई तो वजह होगी। ग़ालिब कसूर तेरा-मेरा नहीं, उन रिश्तों में कहीं न कहीं दग़ा की बात होगी। बदनाम ज़माना करता है मोहब्बत को, मोहब्बत नहीं, जिस्म-जिस्म को चाहता है, रूह को नहीं। जब रूह से मोहब्बत हो तो जिस्म की बात नहीं। आज तुम मेरी हो, कल…
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आँखों का नूर और बेख़बर इश्क़
आँखें, न जाने कहाँ है बेख़बर, तुझको ढूँढ रही है। यहाँ भी मेरी ये नज़र, छुप गए हैं ये बादल। देख तेरे आँखों के नूर को, कोई तो वजह होगी, ढूँढने की तुझको। Jaypeeshayari.in✍️
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इस जनम का कर्ज़.
किसी ने किया खूब लिखा है सुना है इंसान कर्ज़दार होता है हर जनम का मेरा जनम कर्ज़दार है इस जनम का किया लिखने वाले ने हर जनम में मुझे कर्ज़दार चुना है मेरे सिर का साया बचपन में चला गया गरीबी भूख मेरी माँ और मैंने देखी है जब मैं कुछ नासमझ था तो…
क्या आपके पास कोई पुस्तक अनुशंसाएँ हैं?