Mindblown: a blog about philosophy.

  • गरीबी, मोहब्बत और यादों का मेला” – एक अधूरी प्रेम कहानी

    जब में घर से निकला । तो साथ उसका भी था। दोनों थे घर स दूर । डर का साया भी साथ था। कसूर मेरा इतना था । कि मैं गरीब का लाल निकला। छोड़ चला वो एक दिन , दूर किसी देश को। मेरी रोटी खास नहीं लगी उसको। मेहनत मेरी बेकार लगी उसको।…

  • खामोशी और तन्हाई)

    मेरी ख़ामोशी यूँ बोलेगी, दीवारों पर लिखी मेरी दोस्ती बोलेगी। हर उस लम्हे में, जो तन्हाई में गुज़रा, मेरे दर्द की कहानी बोलेगी। मेरे हर ज़र्रे में होगा मेरा ख़त तेरे नाम, कभी मन करे तुझे मिलने का, तो तू आ जाना शाम। मेरे घर की इन ख़ामोश दीवारों को मेरी अधूरी दास्तान सुना जाना।…

  • तेरी हर रात मेरी बातों से गुज़रती होगी | दर्द भरी मोहब्बत शायरी

    तेरी हर रात मेरी बातों से गुज़रती होगी | दर्द भरी मोहब्बत शायरी

    तेरी हर रात मेरी बातों से गुज़रती होगी, मेरी ख़ामोशी भी तुझसे कुछ कहती होगी। मेरी मोहब्बत का फ़साना हर लम्हे तुझे याद आता होगा, जब तू अकेले में मुझे याद करके रोती होगी।। ,, Jaypee shayari.in✍️

  • वक़्त बदला, गाँव बदला – यादों से शहर बनने तक

    देखो, नज़रें झपकी ही थीं कि समय बदल गया। मेरा गाँव ही मानो शहर में बदल गया। जिसमें बचपना गुज़रा मेरा, वो कच्ची गलियाँ आज पक्की हो गई हैं। अब हर घर की दीवारें मिट्टी की नहीं रहीं, सब पत्थर की बन गई हैं। गाँव के एक छोर पर सूरज की किरण पड़ती थी, वहीं…

  • ज़िंदगी और समय पर हिंदी कविता।

    ज़िंदगी और समय पर हिंदी कविता।

    ज़िंदगी पर कविता। ज़िंदगी और समय पर भावनात्मक कविता। यह कविता ज़िंदगी के उन पहलुओं को दिखाती है जहाँ समय, हालात और अपनों का व्यवहार इंसान को उम्र से पहले समझदार बना देता है।   मंद–मंद चल रही है ज़िंदगी, ज़िंदगी को पता है। अभी तो बचपना गुज़रा था, बुढ़ापा आने को खड़ा है।ये समय…

  • एकतरफ़ा मोहब्बत की प्यास

    यह शायरी एक ऐसी मोहब्बत की कहानी कहती है, जहाँ चाहत तो है लेकिन इज़हार की इजाज़त नहीं। “Ab ham khud ko duba bethe h .ab bhi aash h” पंक्ति इस बात को साफ़ दर्शाती है कि इंसान भले ही हालातों में हार गया हो, लेकिन दिल के किसी कोने में उम्मीद अब भी ज़िंदा…

  • भगवान पर आधारित भक्ति शायरी

    कहा कि मैंने मनमानी की, चरित्र से मैं गंदा हूँ। जिसका तू है, मैं भी तो उसी का बंदा हूँ। बस इतना समझ ले प्रभु, अभी तुझसे थोड़ा दूर हूँ, पर मोहब्बत आज भी है तुझसे, इसलिए खुद से ही मजबूर हूँ। तूने मुझे देखा है, पर मैं खुद को छुपाए फिरता हूँ, डर है…

  • कसूर बेख़ुदी का था – मोहब्बत और ज़िंदगी की सच्ची शायरी

    कसूर बेख़ुदी का था – मोहब्बत और ज़िंदगी की सच्ची शायरी

    दर्द भरी मोहब्बत शायरी ज़िंदगी के उन जज़्बातों को बयान करती है, जिन्हें शब्दों में कहना आसान नहीं होता।   कसूर इसका नहीं, इसकी बेख़ुदी का था, ज़माने में इसे यूँ ही किसी ने नहीं पटक दिया। इसके पीछे कसूर इसकी ज़िंदगी का है। यूँ ही ख़ामोश नहीं हो जाते लोग ज़माने में, किसी को…

  • जात, समाज और दो परिंदे

    जात, समाज और दो परिंदे

    कसूर उसका नहीं, मेरी जात का है। ऊँच-नीच का ख़याल उसका नहीं, इस समाज का है। दूर हो जाएँगे दो परिंदे, डर बस इस बात का है। नहीं तो ज़मीन भी उसकी है। और गवाह भी वो ही है, आज उसे समझाने का मोह है। डरता है समाज अपनों की खुशी को देखकर। जात-पात का…

  • परिंदा और मंज़िल

    परिंदा और मंज़िल

    दिलों में दिल को बसाने चला है परिंदा। न असमां का, न उड़ान का पता है। आसमान खुला है, देख जहान को। वो उलझनों में पड़ा है,  है मंज़िल तेरी ऊपर , और ये जहाँ तेरे नीचे पड़ा है।

क्या आपके पास कोई पुस्तक अनुशंसाएँ हैं?