संघर्ष कविता 2…..

मंजिल की तलाश में , अधूरा – सा रह गया हूं.

लगता है संघर्ष कभी ख़त्म नहीं होगा

पूरा जीवन बीत गया ,अब भिड़ में कहीं- सा खो गया हूं मैं

,

चल,फिर मुलाक़ात होगी, संघर्ष की ही बात होगी.

आज तू है तो किया ,कल हमारे संघर्ष की कहानी की बात होगी

कायार होते है, बो जो संघर्ष से डर जाते है

जिनके सीने में आग होती है, बो संघर्ष से लड़ जाते है।

मंजिल उनके कदम चूमती है ,जो ज्वालामुखी बनकर जल जाते है।

संघर्ष से जो लड़ा है ,उसने इतिहास को रचा है।

तुम बनकर रहो ,कायर ,हमने संघर्ष को चुना है

 

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