जब मोहब्बत में कोई ओर आ जाए तन्हाई आ जाए पर कविता ।

कहानी: उदयपुर के राजकुमार की गूढ़ कथा

बहुत प्राचीन समय की बात है। उदयपुर नगर में चंद्रभान नाम का एक धर्मनिष्ठ, न्यायप्रिय और राजनीतिज्ञ राजा राज्य करता था। वह अपनी प्रजा का सच्चा हितैषी था और कभी किसी निर्दोष को दंड नहीं देता था। प्रजा भी उसे हृदय से प्रेम करती थी।

राजा चंद्रभान की तीन रानियाँ थीं—

पहली शाकुंतला, दूसरी मीनाक्षी और तीसरी सावित्री।

तीनों रानियों के बीच ईर्ष्या और द्वेष का भाव सदा बना रहता था, किंतु राजा कभी किसी एक का पक्ष नहीं लेता था।

रानी मीनाक्षी का एक पुत्र था—राजकुमार। वह अत्यंत बुद्धिमान, बलशाली और चतुर था। बहुत कम आयु में ही उसने गूढ़ विद्याओं और कला का ज्ञान प्राप्त कर लिया था। परंतु उसने अपनी माताओं के बीच का कपट, ईर्ष्या और चरित्रहीनता देखी थी, जिससे उसका मन संसार से उदास रहने लगा।

तीनों रानियों का संबंध महल के अश्वपाल से था। यह सब राजकुमार ने अपनी आँखों से देखा था। इसी कारण उसने अपने पिता से कहा—

“पिताजी, मैं इस संसार से दूर, जंगलों के बीच अपना राज्य बसाना चाहता हूँ, जहाँ कोई छल-कपट न हो।”

राजा को शंका हुई कि कहीं उसका पुत्र संन्यास तो नहीं लेना चाहता। उसने कई ऋषि-मुनियों और विद्वानों को बुलाया। विचार-विमर्श के बाद एक मुनि ने कहा—

“राजन, राजकुमार का विवाह करा दीजिए। पत्नी का प्रेम उसे संसार से जोड़ देगा।”

राजा को यह उपाय उचित लगा। शीघ्र ही पास के राज्य की राजकुमारी से राजकुमार का विवाह कर दिया गया।

विवाह के बाद राजकुमार की इच्छा अनुसार जंगल के बीच एक भव्य महल बनवाया गया। वहाँ राजकुमार और रानी सुखपूर्वक रहने लगे। राजकुमार प्रतिदिन पूजा करता और फिर शिकार के लिए निकल जाता। उसके बाहर जाते ही महल के द्वार बंद हो जाते थे। महल में केवल एक खिड़की थी जिससे बाहर देखा जा सकता था।

एक दिन उसी जंगल में एक ग्वाला गायें चराते हुए भटक गया। उसकी एक गाय ने वहीं बछड़े को जन्म दिया। दूध से खीर बनाने हेतु उसे आग चाहिए थी। खोजते-खोजते वह उसी महल तक पहुँचा और द्वार पर आवाज़ लगाई।

खिड़की से रानी ने उसे देखा—युवक तेजस्वी, सरल और आकर्षक था। रानी मोहित हो गई। रानी ने उसे आग दी। ग्वाले के मन में भी रानी के प्रति प्रेम जाग उठा। उसने वचन दिया कि वह अगले दिन दूध की खीर बनाकर लाएगा।

राजकुमार के शिकार पर जाते ही ग्वाला आने लगा और दोनों का प्रेम बढ़ने लगा।

एक दिन राजकुमार को रानी के व्यवहार में परिवर्तन दिखा। उसने शिकार का बहाना कर छिपकर देखा और सब जान लिया। किंतु वह चुप रहा और गहन जंगल में चला गया।

थककर वह एक वृक्ष पर विश्राम करने लगा। तभी उसने एक साधु को देखा, जो एक बोतल से एक सुंदर कन्या को प्रकट करता है। सेवा के बाद साधु सो गया। कन्या ने अपनी बोतल से एक सुंदर युवक निकाला और दोनों ने प्रेम किया। फिर सब पुनः बोतल में समा गए।

राजकुमार सब देख चुका था।

राजकुमार साधु को आदरपूर्वक महल ले आया। भोजन के समय छह थालियाँ लगाई गईं। साधु ने प्रश्न किया—

“यह अतिरिक्त थालियाँ किसके लिए हैं?”

राजकुमार ने सच्चाई उजागर कर दी। भयभीत होकर साधु ने कन्या और उसके प्रेमी को बाहर निकाला। अंत में रानी को भी अपने ग्वाले को बाहर लाना पड़ा।

तब राजकुमार ने कहा—

“न यह मेरी पत्नी मेरी रही, न तुम्हारी शिष्या तुम्हारी। जब मन में छल हो, तो कोई संबंध पवित्र नहीं रहता।”

राजकुमार और साधु ने उन सबको उनके कर्मों पर छोड़ दिया और स्वयं सत्य की खोज में वन-वन विचरण करने लगे।

यहीं यह कथा समाप्त होती है।


प्रकाशित किया गया

में

, ,

द्वारा

टैगस:

टिप्पणियां

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *