ज़िंदगी पर कविता।
ज़िंदगी और समय पर भावनात्मक कविता।
यह कविता ज़िंदगी के उन पहलुओं को दिखाती है जहाँ समय, हालात और अपनों का व्यवहार इंसान को उम्र से पहले समझदार बना देता है।
मंद–मंद चल रही है ज़िंदगी, ज़िंदगी को पता है। अभी तो बचपना गुज़रा था, बुढ़ापा आने को खड़ा है।ये समय का पता नहीं कब गुज़र जाता है,कोई आता है ज़िंदगी में, कोई चुपचाप चला जाता है।
मत पूछो हाल मेरा, मैं ज़िंदगी का सताया हुआ हूँ, हर उस मोड़ से निकलकर आया हूँ जहाँ ज़िंदगी ने बहुत बार गिराया हूं।यूँ ही मैं उम्र से पहले बूढ़ा नहीं हो गया, इस ज़िंदगी का मैं बहुत बार बहकाया हुआ हूँ।
मंद मुस्कान है मेरी, इस मुस्कान में लोगों को चालाकी दिखती है, मुस्कान के पीछे मेरा दर्द नहीं, उन्हें बस मेरी काली परछाईं दिखती है। गुज़रे पलों को याद करता हूँ तो हर पल बस मेरे चलते हुए पगों की तन्हाई दिखती है।
ये तेरा ज़माना आज भी मुझको मनहूस कहता है, छिपे मेरे अपने ही मेरी आस्तीन साफ़ निकले, हर जुर्म किए उसने, पर वो बेदाग़ निकले।
चल अब ज़िंदगी, गुजर कर ले जैसी तू चाहती है, अब हम नहीं बदलेंगे, राह तेरी होगी, गुज़र मेरी होगी।आँधियों में भी अब तेरे नाम के दीपक जलेंगे, चल अब ये ज़िंदगी, दिल की तलब अब पूरी होगी।
Jaypeeshayari.in✍️
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